संघर्ष..

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संघर्ष

#जीवन_यात्रा_में_संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता..
बस उम्र के बढ़ने के साथ संघर्षों के प्रति #मानव_सहज_होता_चला_जाता_है .. #संघर्षों_की_आदत_सी_हो_जाती_है..
जैसे शैशव में शिशु को खड़े होने का संघर्ष ही बहुत बड़ा लगता है ..
बार-बार गिर पड़ना और #पुन:_उठ_खड़े_होने_की_कोशिश..
इस #स़ंघर्ष_की_उम्र_कुछ_ही_दिनों की रहती है..
फिर चलना और फिर दौड़ना और दौड़ते में गिर पड़ना.. उठना और फिर चल पड़ना..
बाल्यकाल के बाद.. किलोल वाली भाग-दौड़.. और गिरना उठना.. बहुत सीमित हो जाता है..
गिरकर उठने… और फिर चल पड़ने का अभ्यास भी झूट जाता है..
किन्तु तब ..
जीवन की दूसरी दौड़ें …
पहले वाली से अगली और बड़ी होती दौड़ें.. बढ़ते जाती हैं ..
जहाँ दूसरों से तेज दौड़ना होता है..
अधिकांंश असफलताओं के बीच किसी-किसी दौड़ में जीत मिलती है…
जीतने के भी दो तरीके हैं..
सिद्ध व्यक्ति; निरंतर श्रम.. अभ्यास आदि से अपनी क्षमता बढ़ाकर जीतना चाहता है…
और दुष्ट मूर्ख; प्रतिस्पर्धी या प्रतिस्पर्धियों को कैसे भी हथकंडे अपनाकर कमजोर करके गिराकर जीतना चाहता है..

  • ‘सुबुद्ध’

अच्छा या बुरा जैसा लगा बतायें ... अच्छाई को प्रोत्साहन मिलेगा ... बुराई दूर की जा सकेगी...

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